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पाकिस्तानी अत्याचार से परेशां, आजादी के लिए रो रहा है पीओके, गिलगित-बाल्टिस्तान

पाकिस्तान जहां संयुक्त राष्ट्र महासभा(यूएनजीए) में विश्व का ध्यान जम्मू एवं कश्मीर की ओर आकृष्ट करने की कोशिश करेगा, वहीं पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले क्षेत्रों में उसके द्वारा किए गए अत्याचार को वहां से आजादी चाह रहे स्थानीय लोगों ने बार-बार उठाया है। वहां के स्थानीय लोगों ने अंतिम बार यह मुद्दा इस माह की शुरुआत में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) की बैठक के दौरान उठाया था, जब गिलगित-बाल्टिस्तान के जानेमाने कार्यकर्ता सेंग एच.सेरिंग ने कहा था कि जिस क्षेत्र से वह आते हैं, वह ‘भारत का हिस्सा’ है।

वाशिंगटन डी.सी. में गिलगित-बाल्टिस्तान अध्ययन के निदेशक सेरिंग ने यूएनएचआरसी में 11 सितंबर को कहा था, “गिलगित-बाल्टिस्तान भारत का हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों को यह समझने की जरूरत है कि पाकिस्तान बीते 70 वर्षो से वहां एक बड़ी बाधा बन गया है।”

उन्होंने पाकिस्तान पर वहां की जनसांख्यिकी बदलने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा, “आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे कि जहां पाकिस्तान कश्मीरी लोगों का प्रतिनिध बनने की कोशिश कर रहा है, वहीं इसने बड़े पैमाने पर जनसांख्यिकी में बदलाव कर दिया है।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत द्वारा हटाया गया अनुच्छेद 370 जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवाद फैलाने का एक हथियार बन गया था।

पाकिस्तान के कब्जे वाला गिलगित-बाल्टिस्तान दशकों तक बिना किसी कम्यूनिकेशन के रहा है।

पाकिस्तान ने 1963 में पीओके का एक भाग चीन को दे दिया था। हालांकि पीओके, जिसे पाकिस्तान आजाद जम्मू एवं कश्मीर कहता है, उसका अपना संविधान, प्रधानमंत्री और एक राष्ट्रपति है, लेकिन इसकी वास्तविक शक्ति इस्लामाबाद के पास ही है। जम्मू एवं कश्मीर के तत्कालीन राजा हरि सिंह ने जब 26 अक्टूबर, 1947 को भारत के साथ ‘विलय पत्र’ पर हस्ताक्षर किया था, तभी से भारत का मानना है कि पूरा पीओके भारत का अभिन्न हिस्सा है।

इस्लामाबाद ने 1949 में गिलगित-बाल्टिस्तान का प्रशासन अपने हाथों में ले लिया था। इसका संवैधानिक दर्जा अधर में लटका हुआ है। पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान को पांचवें प्रांत का दर्जा देने से इनकार कर दिया है। क्योंकि पाकिस्तान को डर है कि यह कदम कश्मीर मुद्दे के समाधान की उसकी मांग के साथ समझौता करना होगा।

बीते वर्ष, पाकिस्तान ने गिलगिल-बाल्टिस्तान आदेश जारी किया था, जिसके तहत स्थानीय परिषद के पास बचीखुची रहीं शक्तियां भी छीन कर प्रधानमंत्री को दे दी गईं।

वास्तवकिता यह है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त(ओएचसीएचआर) ने जुलाई की अपनी रिपोर्ट में पीओके और खासकर गिलगित-बाल्टिस्तान में बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन का उल्लेख किया था।

ओएचसीएचआर ने स्पष्ट रूप से अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ‘आजाद जम्मू एवं कश्मीर और गिलगित बाल्टिस्तान में अभिव्यक्ति, विचार, शांतिपूर्ण तरीके से एकत्रित होने की आजादी पर नियंत्रण’ ने ओएचसीएचआर समेत मानवाधिकार पर्यवेक्षकों को वहां की मानवधिकार स्थिति का जायजा लेने से रोक दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों क्षेत्रों में संवैधानिक बदलाव किए गए हैं, लेकिन ये लोग ‘मुख्य समस्या को सुलझाने में विफल रहे हैं, जो इन क्षेत्रों में रह रहे लोगों के पूरे मानवाधिकरों पर पाबंदी लगाता है।’

ओएचसीएचआर ने कहा था कि ‘आजाद जम्मू एवं कश्मीर का अंतरिम संविधान पाकिस्तान के कब्जे की आलोचना करने वाले किसी भी नागरिक पर कई तरह की पाबंदियां लगाता है, जबकि यह पाकिस्तान के अभिव्यक्ति, विचार रखने और सभा करने की आजादी के सभी दावों के उलट है।’

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